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रविवार, 13 मई 2012

डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’ की एक 'राजस्थानी ग़ज़ल'


डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’ का जन्म 24 जून 1932 को झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील के एक ग्राम जोलपा के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। डॉ. राकेश ने विषम पारिवारिक परिस्थितियों के होते हुए भी उच्च शिक्षा कोटा, जयपुर, उदयपुर में की। डॉ. राकेश अपने जीवन के विद्यार्थी काल से ही सामाजिक नेतृत्व, राजनैतिक सक्रियता एवं साहित्य-सृजन में उन्मुख थे।
डॉ. राकेश हिन्दी व राजस्थानी में समान रूप से रचना करते थे। डॉ. राकेश ने शोध, समालोचना, उपन्यास, जीवनी, नाटक, कहानी, कविता आदि कई विधाओं और शैलियों में साहित्य रचना की। डॉ. राकेश की एक दर्जन से अधिक हिन्दी, राजस्थानी की पुस्तकें तथा अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हैं। डॉ. राकेश, राजस्थान साहित्य अकादमी और राजस्थान भाषा अकादमी से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। साथ ही अन्य अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक सामाजिक संस्थाओं में भी अपना मार्गदर्शक योगदान देते रहे। वे ‘मधुमती’ ‘जागती जोत’ के सम्पादक तथा राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति अकादमी के अध्यक्ष भी रहे।

डॉ. राकेश सदैव अपनी प्रगतिशील प्रवृत्तियों के साथ समकालीन विशेषतः आधुनिक लेखन व युवा लेखकों से सम्पर्कित रहे।
पिछले वर्ष डॉ. राकेश हमारे बीच नहीं रहे। उन के जीवन के आत्मीय प्रसंगों की स्मृतियाँ और साहित्यिक रचनाएँ हमारी धरोहर हैं। वे सदैव आरणीय एवं स्मरणीय रहेंगे।  अभिव्यक्ति के 38वें अंक में उन की दो काव्य रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं। उन में से उन की एक राजस्थानी ग़ज़ल यहाँ प्रस्तुत है-

                                                                                                                               - अम्बिकादत्त


'राजस्थानी  ग़ज़ल'
  • डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’

आर छै न पार छै
नाव छै’र धार छै।।

सांस एक पावणी
धूंकणी उधार छै।।

कांच को बणज करै
दोगला बजार छै।।

मखमली लबास का
पोत तार-तार छै।।

हेत कै समंदरां
घूंट-ल्यां तो खार छै।।

धार छोड़ फूटल्यां,
यो कस्यो बच्यार छै।।

ये बखत का ढावला
एक दिन उतार छै।।

बोझ सब उलीज द्यो
नाव आर पार छै।।


बुधवार, 9 मई 2012

कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब के साथ -शहरयार


शहूर शायर शहरयार हाल ही में हमारे बीच से गुजर गये। उन्होंने प्रगतिशील शायरी के कलात्मक-पक्ष को गहरा किया। फिल्म ‘उमरावजान’ के लिए लिखी गई ग़ज़लों व नज़्मों से उन्हें विशेष ख्याति मिली। मिर्ज़ा गालिब एवार्ड एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। अपने करीबी जनवादी लेखक साथी डॉ. कुँवरपाल सिंह की स्मृति में उनके द्वारा लिखी एक कविता और दो ग़ज़लें अभिव्यक्ति के 38वें अंक में प्रकाशित की गई हैं,  यहाँ उन की एक ग़ज़ल प्रस्तुत है-  


ग़ज़ल


कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब के साथ
कि आज धूप नहीं निकली आफताब के साथ

तो फिर बताओ समन्दर सदा को क्यूँ सुनते
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ

बादिल अजीब महक साथ ले के आई है
नसीम रात बसर की किसी गुलाब के साथ

फिजाँ में दूर तलक मरहबा के नारे हैं
गुजरने वाले हैं कुछ लोग यहाँ से ख्वाब के साथ

जमीन तेरी कशिश खींचती रही हम को
गये जरूर थे कुछ दूर महताब के साथ


मंगलवार, 8 मई 2012

तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या? -शहरयार

शहूर शायर शह्रयार हाल ही में हमारे बीच से गुजर गये। उन्होंने प्रगतिशील शायरी के कलात्मक-पक्ष को गहरा किया। फिल्म ‘उमरावजान’ के लिए लिखी गई ग़ज़लों व नज़्मों से उन्हें विशेष ख्याति मिली। मिर्ज़ा गालिब एवार्ड एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। अपने करीबी जनवादी लेखक साथी डॉ. कुँवरपाल सिंह की स्मृति में उनके द्वारा लिखी एक कविता और दो ग़ज़लें अभिव्यक्ति के 38वें अंक में प्रकाशित की गई हैं,  यहाँ उन की एक ग़ज़ल प्रस्तुत है- 


ग़ज़ल

तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या?
कि तुमने चीख़ों को सचमुच सुना नहीं है क्या?


तमाम ख़ल्के-ख़ुदा इस जगह रूकी क्यों है?
यहाँ से आगे कोई रास्ता नहीं है क्या

लहू-लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को
किसी को ख़ौफ़ यहाँ रात का नहीं है क्या?

मैं एक ज़माने से हैरान हूँ कि हाकिमे-शहर
जो हो रहा है उसे देखता नहीं है क्या?

उजाड़ते हैं जो नादाँ इसे उजड़ने दो
कि उजड़ा शहर दोबारा बसा नहीं है क्या?