अभिव्यक्ति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अभिव्यक्ति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 15 जुलाई 2012

कैसे फिर मंगलमय होंगे आने वाले साल

डॉ. इन्द्र बिहारी सक्सेना का एक गीत











आने वाले साल


घात लगाए जहां भेडि़ए, मुंह बाए घडि़याल,
कैसे फिर मंगलमय होंगे आने वाले साल।।


बैठ पंक्ति में अब कौवों की, कोयल ने स्वर बदले,
हंसों के आदर्श बन गए मिथ्याचारी बगुले।
अब तो संसद भी लगती है कुंजड़ों की चौपाल।।


घने हुए बरगद, आंगन की हर तुलसी मुरझाई,
कहीं मख़मली जूती पग में, रिसती कहीं बिवाई।
जूठन तक को जहाँ तरसते हों नन्हें गोपाल।।


चिथड़ों की मोहताज बनी झौपडि़यों की तरुणाई,
गिद्धों की नज़रों को खलती, हर नटखट अंगड़ाई।
नैतिक मूल्यों के भविष्य की बुझने लगी मशाल।।


तन झुलसाए जेठ-दोपहरी, पौष बदन ठिठुराए,
प्रलयंकारी घन गर्जन से, धरा, गगन अकुलाए।
सुरसा बनकर खड़ी निरंकुश मंहगाई विकराल।।


बलात्कार, डाके, हत्याऐं, चोरी, रिश्वतख़ोरी,
मेहनतकश रोटी को तरसें, गुण्डे भरें तिजोरी।
फिर भी क्यों इस युवा-रक्त में आता नहीं उबाल।।


० डॉ. इन्द्र बिहारी सक्सेना
- गली नं. 13, पूनम कॉलोनी, कोटा जंक्शन

सोमवार, 25 जून 2012

बिना कलम के खुद की जिनगी लिखती है बाबू।

शान्ति सुमन के दो गीत





इसी शहर में

इसी शहर में ललमुनिया भी
रहती है बाबू
आग बचाने खातिर कोयला
चुनती है बाबू

पेट नहीं भर सका
रोज के रोज दिहाड़ी से
मन करे चढ़कर गिर
जाये उंची पहाड़ी से

लोग कहेंगे क्या यह भी तो
गुनती है बाबू

चकाचौंध बिजलियों
की जब बढ़ती है रातों में
खाली देह जला--
करती है मन की बातों में

रोज तमाशा देख आंख से
सुनती है बाबू

तीन अठन्नी लेकर
भागी उसकी भाभी घर से
पहली बार लगा कि
टूट जाएगी वह जड़ से

बिना कलम के खुद की जिनगी
लिखती है बाबू।

खुशी के आँसू

उनके घरों की तस्वीरें हॅंसती हैं
अपने घर की दीवारें रोती हैं

जोड़ रही उंगली पर आधे
अपने बीते दिन को
कितने कब भूखे सोये बच्चे
लगे गड़ांसे मन को

बिना जले वह धुआं-धुआं होती है

दिनों से दीखा कुछ नहीं कभी
खुशी के आंसू जैसा
दरवाजे तक बहुत उड़ा हुआ
है कागज सांसों का

बदली हुई हवा नारे बोती है

नीदों भरे सपनों से उसको
हासिल नहीं हुआ जो
संगीत को उम्मीद के सुनते
जिला-जिला रखती जो

कठिन हौसले ही मन के मोती हैं।

० शांति सुमन
- 36, ऒफीसर्स फ्लैट्स, जुबली रोड, नार्दर्न टाउन, जमशेदपुर

रविवार, 17 जून 2012

शिवराम की स्मृति में दो दिवसीय आयोजन


शिवराम की स्मृति में दो दिवसीय आयोजन

जन-गण के पक्ष में रचनाकर्म करने के साथ उन तक पहुँचाना भी होगा


किसी ने कहा शिवराम बेहतरीन नाटककार थे, हिन्दी नुक्कड़नाटकों के जन्मदाता, कोई कह रहा था वे एक अच्छे जन-कवि थे, किसी ने बताया शिवराम एक अच्छे आलोचक थे, कोई कह रहा था वे प्रखर वक्ता थे, किसी ने कहा वे अच्छे संगठनकर्ता थे और हर जनान्दोलन में वे आगे रहते थे, एक लड़की कह रही थी, बच्चों को वे मित्र लगते थे। टेलीकॉम वाले बता रहे थे वे जबरदस्त ट्रेडयूनियनिस्ट थे, दूसरे ने बताया वे श्रेष्ठ अभिनेता और नाट्यनिर्देशक थे। भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ( यूनाइटेड ) के जिला सचिव बता रहे थे वे पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य थे, उन के देहान्त का समाचार मिलते ही एक और पोलित ब्यूरो सदस्य उन की अंत्येष्टी में कोटा पहुँचे थे और तब सब लोग कह रहे थे कि  शिवराम का निधन कोटा और राजस्थान के जनान्दोलन की बहुत बड़ी क्षति है तो वे कहने लगे कि यह कोटा की नहीं देश भर के श्रमजीवी जन-गण की क्षति है। पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व उन से देशव्यापी नेतृत्वकारी भूमिका की अपेक्षा रखता था।

तने सारे तथ्य शिवराम के बारे में सामने आ रहे थे कि हर कोई चकित था। शायद कोई भी संपूर्ण शिवराम से परिचित ही नहीं था। हर कोई उन का वह दिखा रहा था जो उस ने देखा, अनुभव किया था। इन सब तथ्यों को सुनने के बाद लग रहा था कि संपूर्ण शिवराम को पुनर्सृजित कर उन्हें पहचानने में अभी हमें वर्षों लगेंगे। फिर भी बहुत से तथ्य ऐसे छूट ही जाएंगे जो शायद उन के पुनर्सर्जकों के पास नहीं पहुँच सकें। जब वे सम्पूर्ण शिवराम का संपादन कर के उसे प्रेस में दे चुके होंगे तब, जब उस के प्रूफ देखे जा रहे होंगे तब और जब पुस्तक प्रकाशित हो कर उस का विमोचन हो रहा होगा तब भी कुछ लोग ऐसे आ ही जाएंगे जो फिर से कहेंगे, नहीं इस शिवराम को वे नहीं जानते, हम जिस शिवराम को जानते हैं वह तो कुछ और ही था।

शिवराम को हमारे बीच से गए एक वर्ष हो गया है। यहाँ कोटा में उन के पहले वार्षिक स्मरण के अवसर पर भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (यूनाइटेड), राजस्थान ट्रेड यूनियन केन्द्र और अखिल भारतीय जनवादी युवा मोर्चा ने श्रृद्धांजलि सभा का आयोजन किया।  प्रेस-क्लब सभागार में हुई श्रृद्धांजलि सभा दिल्ली से आए मुख्य-अतिथि शैलेन्द्र चैहान द्वारा मशाल- प्रज्ज्वलन के साथ आरंभ हुई। इस सभा में हाड़ौती अंचल के विभिन्न श्रमिक कर्मचारी संगठनों एवं सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ शिवराम की माताजी श्रीमती कलावती और पत्नी श्रीमती सोमवती द्वारा उनके के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रृद्धांजलि अर्पित की। सभा में उन के पुत्र रवि कुमार, शशि कुमार और डॉ. पवन कुमार अपनी भूमिकाओं के साथ उपस्थित थे।

शैलेन्द्र चैहान ने अपने उद्बोधन में कहा कि हमें शिवराम की स्तुति करने के बजाय उनके विचारों, कार्य-पद्धति और श्रमजीवी जन-गण के प्रति समर्पण से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होने कहा कि पुरानी जड़ परम्परा और नैतिकता के स्थान पर श्रमिकों, किसानों के जीवन के यथार्थ से जुड़ी सच्चाइयों का अध्ययन करते हुए क्रांतिकारी नैतिकता को आत्मसात करना चाहिए। क्रांतिकारी नैतिकता के बिना जन-गण के किसी भी संघर्ष को आगे बढ़ा सकना संभव नहीं है।  सफल प्रथम-सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साम्यवादी साथी विजय शंकर झा ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था अपने पतन के कगार पर है, व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन से ही देश की शोषित, पीडि़त जनता के जीवन में खुशहाली संभव है। शिवराम इस परिवर्तन के लिए समर्पित थे। श्रृद्धांजलि-सत्र के पश्चात् शिवराम के प्रसिद्ध नाटक ‘‘जनता पागल हो गई है” की नुक्कड़ नाटक प्रस्तुति को सैंकड़ों दर्शकों ने देखा और सराहा। नाटक में रोहित पुरूषोत्तम (सरकार), आशीष मोदी (जनता), अजहर (पागल), पवन कुमार (पुलिस अधिकारी) और कपिल सिद्धार्थ (पूंजीपति) की भूमिकाओं को बेहतरीन रीति से अदा किया। लगा जैसे इसे शिवराम ने ही निर्देशित किया हो।
जनता पागल हो गई है की नाट्य प्रस्तुति

साँयकालीन सत्र में ‘‘साथी शिवराम के संकल्पों का भारत’’ विषय पर मुख्य वक्ता साहित्यकार महेन्द्र नेह ने कहा कि वर्तमान दौर में अमेरिका सहित पूरी पूंजीवादी दुनिया गहरे आर्थिक संकट में फँस गई है। हमारे देश के शासक घोटालों और भ्रष्टाचार में लिप्त होकर जन-विरोधी रास्ते पर चल पड़े हैं। आने वाले दिनों में समूची दुनिया में जन-आन्दोलन बढ़ेंगे तथा भ्रष्ट-सत्ताएँ ताश के पत्तों की तरह बिखरेंगी। सत्र के अध्यक्ष आर.पी. तिवारी ने कहा कि मेहनतकश जनता का जीवन निर्वाह शासकों ने मुश्किल बना दिया है, लेकिन बिना क्रान्तिकारी विचार और संगठन के परिवर्तन संभव नहीं। दोनों सत्रों में त्रिलोक सिंह, प्यारेलाल, टी.जी. विजय कुमार, शब्बीर अहमद, विजय सिंह पालीवाल, जाकिर भाई, विवेक चतुर्वेदी, पुरूषोत्तम ‘यकीन’ और राजेन्द्र कुमार ने अपने विचार व्यक्त किए। संचालन महेन्द्र पाण्डेय ने किया। दोनों सत्रों के दौरान प्रसिद्ध नाट्य अभिनेत्री ऋचा शर्मा ने शिवराम की कविताओं का पाठ किया, शायर शकूर अनवर एवं रवि कुमार ने शायरी एवं कविता पोस्टर प्रदर्शनी के माध्यम से अपनी बातें कही।

2 अक्टूबर को कोटा के प्रेस क्लब सभागार में ही ‘विकल्प’ अखिल भारतीय सांस्कृतिक सामाजिक मोर्चा द्वारा परिचर्चाओं का आयोजन किया। कार्यक्रम का आगाज हाड़ौती अंचल के वरिष्ठ गीतकार रघुराज सिंह हाड़ा, मदन मदिर, महेन्द्र नेह सहित मंचस्थ लेखकों ने मशाल प्रज्ज्वलित करके किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में ओम नागर और सी.एल. सांखला ने शिवराम के प्रति अपनी सार्थक कविताएँ प्रस्तुत की।

प्रथम गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार रघुराज सिंह हाड़ा ने ‘‘जन संस्कृति के युगान्तरकारी सर्जक शिवराम’’ विषय पर बोलते हुए बताया कि शिवराम का लेखन ठहराव से बदलाव की ओर ले जाने का लेखन है। उन्हों ने साहित्य के बन्धे-बन्धाए रास्तों को तोड़ कर आम जन के पक्ष में युगान्तरकारी भूमिका निभाई। मुख्य वक्ता मदन मदिर ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि सत्ता और मीडिया ने जनता के पक्ष की भाषा और शब्दों का अवमूल्यन कर दिया है। शिवराम ने अपने नाटकों और साहित्य में जन भाषा का प्रयोग करके अभिजनवादी संस्कॄति को चुनौती दी। वे सच्चे अर्थों में कालजयी रचनाकार थे। कथाकार लता शर्मा ने कहा कि शिवराम ने अपनी कला का विकास उस धूल-मिट्टी  और जमीन पर किया जिसे श्रमिक और किसान अपने पसीने से सींचते हैं। उनका लेखन उनकी दुरूह यात्रा का दस्तावेज है। डॉ. फारूक बख्शी ने फैज अहमद ‘फैज’ की गज़लों के माध्यम से शिवराम के लेखन की ऊँचाई को व्यक्त किया। डॉ. रामकॄष्ण आर्य ने शिवराम को एक निर्भीक एवं मानवतावादी रचनाकार बताया। टी.जी. विजय कुमार ने उन्हे संघर्षशील एवं विवेकवान लेखक की संज्ञा दी। प्रथम सत्र का संचालन महेन्द्र नेह ने किया।

दूसरे सत्र में  ‘‘अभावों से जूझते जन-गण एवं लेखकों- कलाकारों की भूमिका’’ विषय पर आयोजित परिचर्चा का आरंभ संचालक शकूर अनवर ने गालिब की शायरी के माध्यम से अपने समय की यथार्थ अक्कासी और आजादी के पक्ष में शिवराम की भूमिका को खोल कर किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए दिनेशराय द्विवेदी ने कहा कि शिवराम की भूमिका स्पष्ट थी, उन के संपूर्ण कर्म का लक्ष्य जन-गण की हर प्रकार के शोषण की मुक्ति था। उन्हों ने अपने नाट्यकर्म, लेखन, संगठन और शोषित पीडि़त जन के हर संघर्ष में उपस्थिति से सिद्ध किया कि साहित्य युग परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेखकों और कलाकारों को जन-गण के पक्ष में रचनाकर्म करना ही नहीं है, प्रेमचंद की तरह उसे जनता तक पहुँचाने की भूमिका भी खुद ही निबाहनी होगी। मुख्य वक्ता श्रीमती डॉ. उषा झा ने अपने लिखित पर्चे में साहित्य की युग परिवर्तनकारी भूमिका को कबीर, निराला, मुक्तिबोध आदि कवियों के उद्धरणों से सिद्ध किया। अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि बाजारवाद ने हमारे साहित्य एवं जन-संस्कृति को सबसे अधिक हानि पहुँचाई है। नारायण शर्मा ने कहा कि जब प्रकृति क्षण-क्षण बदलती है तो समाज को क्यों कर नहीं बदला जा सकता? रंगकर्मी संदीप राय ने अपना मत व्यक्त करते हुए कहा कि नाटक जनता के पक्ष में सर्वाधिक उपयोगी माध्यम है। प्रो. हितेश व्यास ने कहा कि शिवराम ने विचलित कर देने वाले नाटक लिखे और प्रतिपक्ष की उल्लेखनीय भूमिका निभाई। अरविन्द सोरल ने कहा कि समय की निहाई पर शिवराम के लेखन का उचित मूल्यांकन होगा।

चित्रकार व कवि रवि कुमार द्वारा शिवराम की कविताओं की पोस्टर-प्रदर्शनी को नगर के प्रबुद्ध श्रोताओं, लेखकों, कलाकारों ओर आमजन ने सराहा। ‘विकल्प’ की ओर से अखिलेश अंजुम ने सभी उपस्थित जनों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।


० दिनेशराय द्विवेदी

शुक्रवार, 8 जून 2012

अर्जुन कवि के दोहे

अर्जुन कवि के दोहे

( अर्जुन कवि ने अपने जीवन में दस लाख दोहे लिखे। उनका नाम ‘वर्ल्ड गिनीज बुक’ में शामिल किया गया। कबीर की तरह वे भी किसी विद्यालय में नहीं पड़े, किन्तु अपने अनुभव से अनीश्वरवाद की समझ तक पहुंचे। )




अर्जुन अनपढ़ आदमी, पढ्यौ न काहू ज्ञान।
मैंने तो दुनिया पढ़ी, जन-मन लिखूँ निदान।।


रोटी तू छोटी नहीं, तो से बड़ौ न कोय।
राम नाम तोमें बिकै, छोड़ै सन्त न तोय।।


उत्पादक की साख है, जग पहचान हजार।
चन्दा पै ते दीखती, खड़ी चीन दीवार।।


राज मजब विद्या धनै, हैगौ इन अभिमान।
ठगै, काम सैतान के, होय न जन-कल्यान।।


पंच-तत्व को बाप है, सिरम तत्व पिरधान।
या के बिन वे ना फलैं, भूखों मरै जहान।।


नाम नासतिक धरि दियौ, जिनकूँ सच्चो ज्ञान।
पाखण्डै मानैं नहीं, कुदरत है भगवान।।


अर्जुन बुल बुल का करै, परे पिछारी काग।
ऊपर दुश्मन बाज है, नीचे बैरी नाग।।


मन्दिर मस्जिद आपके, हैं कैसे भगवान।
पण्डित मुल्ला नित लड़ें, अपने-अपने मान।।


आजादी आंधी चली, हवा दीन तक नाँय।
दिन सूरज की धूप में, राति राति में जाय।।


अर्जुन भारत राज में, उड़ै मंतरी मोर।
कंचन पंख समेटते, घोटाले घनघोर।।


कुदरत नैं धरती रची, लिखा न हिन्दुस्तान।
ना अमरीका, रूस है, ना ही पाकिस्तान।।


तू पौधा कब ते भई, अमरबेल विष बेल।
धरती तक देखी नहीं, अमृत पियै सकेल।।


उडि़ गये हंसा देश के, आजादी दिलवाय।
रह गये बगुला तीर पै, राज तिलक करवाय।।


लाखन साधुन में कहीं, मिलै न काबिल एक।
उत्पादक सब काबिलै, दे फल पेड़ हरेक।।

० अर्जुन कवि
- कवि कुटीर, चटीकना, जिला करौली  ( राज. )

शुक्रवार, 18 मई 2012

मैं चलूंगा - डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’ की एक कविता




डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’ का जन्म 24 जून 1932 को झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील के एक ग्राम जोलपा के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। डॉ. राकेश ने विषम पारिवारिक परिस्थितियों के होते हुए भी उच्च शिक्षा कोटा, जयपुर, उदयपुर में की। डॉ. राकेश अपने जीवन के विद्यार्थी काल से ही सामाजिक नेतृत्व, राजनैतिक सक्रियता एवं साहित्य-सृजन में उन्मुख थे। 

डॉ. राकेश हिन्दी व राजस्थानी में समान रूप से रचना करते थे। डॉ. राकेश ने शोध, समालोचना, उपन्यास, जीवनी, नाटक, कहानी, कविता आदि कई विधाओं और शैलियों में साहित्य रचना की। डॉ. राकेश की एक दर्जन से अधिक हिन्दी, राजस्थानी की पुस्तकें तथा अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हैं। डॉ. राकेश, राजस्थान साहित्य अकादमी और राजस्थान भाषा अकादमी से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। साथ ही अन्य अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक सामाजिक संस्थाओं में भी अपना मार्गदर्शक योगदान देते रहे। वे ‘मधुमती’ ‘जागती जोत’ के सम्पादक तथा राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति अकादमी के अध्यक्ष भी रहे।

डॉ. राकेश सदैव अपनी प्रगतिशील प्रवृत्तियों के साथ समकालीन विशेषतः आधुनिक लेखन व युवा लेखकों से सम्पर्कित रहे।
पिछले वर्ष डॉ. राकेश हमारे बीच नहीं रहे। उन के जीवन के आत्मीय प्रसंगों की स्मृतियाँ और साहित्यिक रचनाएँ हमारी धरोहर हैं। वे सदैव आरणीय एवं स्मरणीय रहेंगे। अभिव्यक्ति के 38वें अंक में उन की दो काव्य रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं। उन में से उन की एक कविता यहाँ प्रस्तुत है-
                                                                                                                              - अम्बिकादत्त

'कविता'
मैं चलूंगा 
  •  डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’
मैं चलूंगा
क्योंकि चलकर ही पहुँच पाया यहाँ तक

कौन जाने - और चला है कहाँ तक
यात्रा लम्बे सफर की

हाशिए पर ही खड़ी चुपचाप अब तक
देखना है तपस्या युग की
रहेगी बांझ कब तक।।

अनलिखा भवितव्य है इस त्रासदी का
हूँ अकेला भगीरथ शापित सदी का

चल पड़ा हूँ अब धरा पर
संतरण होगा नदी का।।

सूर्य मेरे!
लो विदा अध्याय के अगले चरण की
सांध्य वेला-दीपमाला के वरण की।।

रोशनी तो है विरासत यात्रा की
मैं चलूंगा
क्योंकि चलकर ही
पहुँच पाया यहाँ तक।।

रविवार, 13 मई 2012

डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’ की एक 'राजस्थानी ग़ज़ल'


डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’ का जन्म 24 जून 1932 को झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील के एक ग्राम जोलपा के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। डॉ. राकेश ने विषम पारिवारिक परिस्थितियों के होते हुए भी उच्च शिक्षा कोटा, जयपुर, उदयपुर में की। डॉ. राकेश अपने जीवन के विद्यार्थी काल से ही सामाजिक नेतृत्व, राजनैतिक सक्रियता एवं साहित्य-सृजन में उन्मुख थे।
डॉ. राकेश हिन्दी व राजस्थानी में समान रूप से रचना करते थे। डॉ. राकेश ने शोध, समालोचना, उपन्यास, जीवनी, नाटक, कहानी, कविता आदि कई विधाओं और शैलियों में साहित्य रचना की। डॉ. राकेश की एक दर्जन से अधिक हिन्दी, राजस्थानी की पुस्तकें तथा अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हैं। डॉ. राकेश, राजस्थान साहित्य अकादमी और राजस्थान भाषा अकादमी से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। साथ ही अन्य अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक सामाजिक संस्थाओं में भी अपना मार्गदर्शक योगदान देते रहे। वे ‘मधुमती’ ‘जागती जोत’ के सम्पादक तथा राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति अकादमी के अध्यक्ष भी रहे।

डॉ. राकेश सदैव अपनी प्रगतिशील प्रवृत्तियों के साथ समकालीन विशेषतः आधुनिक लेखन व युवा लेखकों से सम्पर्कित रहे।
पिछले वर्ष डॉ. राकेश हमारे बीच नहीं रहे। उन के जीवन के आत्मीय प्रसंगों की स्मृतियाँ और साहित्यिक रचनाएँ हमारी धरोहर हैं। वे सदैव आरणीय एवं स्मरणीय रहेंगे।  अभिव्यक्ति के 38वें अंक में उन की दो काव्य रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं। उन में से उन की एक राजस्थानी ग़ज़ल यहाँ प्रस्तुत है-

                                                                                                                               - अम्बिकादत्त


'राजस्थानी  ग़ज़ल'
  • डॉ. शान्तिलाल भारद्वाज ‘राकेश’

आर छै न पार छै
नाव छै’र धार छै।।

सांस एक पावणी
धूंकणी उधार छै।।

कांच को बणज करै
दोगला बजार छै।।

मखमली लबास का
पोत तार-तार छै।।

हेत कै समंदरां
घूंट-ल्यां तो खार छै।।

धार छोड़ फूटल्यां,
यो कस्यो बच्यार छै।।

ये बखत का ढावला
एक दिन उतार छै।।

बोझ सब उलीज द्यो
नाव आर पार छै।।


बुधवार, 9 मई 2012

कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब के साथ -शहरयार


शहूर शायर शहरयार हाल ही में हमारे बीच से गुजर गये। उन्होंने प्रगतिशील शायरी के कलात्मक-पक्ष को गहरा किया। फिल्म ‘उमरावजान’ के लिए लिखी गई ग़ज़लों व नज़्मों से उन्हें विशेष ख्याति मिली। मिर्ज़ा गालिब एवार्ड एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। अपने करीबी जनवादी लेखक साथी डॉ. कुँवरपाल सिंह की स्मृति में उनके द्वारा लिखी एक कविता और दो ग़ज़लें अभिव्यक्ति के 38वें अंक में प्रकाशित की गई हैं,  यहाँ उन की एक ग़ज़ल प्रस्तुत है-  


ग़ज़ल


कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब के साथ
कि आज धूप नहीं निकली आफताब के साथ

तो फिर बताओ समन्दर सदा को क्यूँ सुनते
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ

बादिल अजीब महक साथ ले के आई है
नसीम रात बसर की किसी गुलाब के साथ

फिजाँ में दूर तलक मरहबा के नारे हैं
गुजरने वाले हैं कुछ लोग यहाँ से ख्वाब के साथ

जमीन तेरी कशिश खींचती रही हम को
गये जरूर थे कुछ दूर महताब के साथ


मंगलवार, 8 मई 2012

तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या? -शहरयार

शहूर शायर शह्रयार हाल ही में हमारे बीच से गुजर गये। उन्होंने प्रगतिशील शायरी के कलात्मक-पक्ष को गहरा किया। फिल्म ‘उमरावजान’ के लिए लिखी गई ग़ज़लों व नज़्मों से उन्हें विशेष ख्याति मिली। मिर्ज़ा गालिब एवार्ड एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। अपने करीबी जनवादी लेखक साथी डॉ. कुँवरपाल सिंह की स्मृति में उनके द्वारा लिखी एक कविता और दो ग़ज़लें अभिव्यक्ति के 38वें अंक में प्रकाशित की गई हैं,  यहाँ उन की एक ग़ज़ल प्रस्तुत है- 


ग़ज़ल

तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या?
कि तुमने चीख़ों को सचमुच सुना नहीं है क्या?


तमाम ख़ल्के-ख़ुदा इस जगह रूकी क्यों है?
यहाँ से आगे कोई रास्ता नहीं है क्या

लहू-लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को
किसी को ख़ौफ़ यहाँ रात का नहीं है क्या?

मैं एक ज़माने से हैरान हूँ कि हाकिमे-शहर
जो हो रहा है उसे देखता नहीं है क्या?

उजाड़ते हैं जो नादाँ इसे उजड़ने दो
कि उजड़ा शहर दोबारा बसा नहीं है क्या?

शनिवार, 5 मई 2012

मौत तू जीती है ..... वो हारा नहीं -शहरयार

शहरयार
शहूर शायर शहरयार हाल ही में हमारे बीच से गुजर गये। उन्होंने प्रगतिशील शायरी के कलात्मक-पक्ष को गहरा किया। फिल्म ‘उमरावजान’ के लिए लिखी गई ग़ज़लों व नज़्मों से उन्हें विशेष ख्याति मिली। मिर्ज़ा गालिब एवार्ड एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया। अपने करीबी जनवादी लेखक साथी डॉ. कुँवरपाल सिंह की स्मृति में उनके द्वारा लिखी एक कविता और दो ग़ज़लें अभिव्यक्ति के 38वें अंक में प्रकाशित की गई हैं,  यहाँ उन की कविता प्रस्तुत है-  


 डॉ. कुँवरपाल सिंह की स्मृति में लिखी एक कविता 



मौत तू जीती है .....
        वो हारा नहीं
शहर में मौजूद होता मैं, तो तुझको देखता
ऐ हवा!
तू मेरा सूरज बुझाती किस तरह
वो सरापा ज़िन्दगी था
रोशनी... बस रोशनी था

    ख़्वाब देखे और दिखाये उम्र भर
    ख़्वाब उसके पास इतने थे
    कि नींदें कम पड़ीं
    इस ज़मीं के वास्ते
    आसमां से उसने झगड़ा कर लिया
    जो कहा करके दिखाया

अहद... मेरे अहद की पहचान था वह
कुछ अजब ही और अलग इन्सान था वह
वो जिया तो अपनी शर्तों पर जिया
कोई समझौता कहाँ उसने किया!
ज़िन्दगी के खेल में सच है यही
मौत तू जीती है... वो हारा नहीं









गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

अदम गोंडवी की कविता 'चमारों की गली'


(अदम गोंडवी भी नहीं रहे। साहित्यिक प्रतिष्ठानों और प्रतिष्ठित साहित्यिकों की उपेक्षा और अवमानना को दरकिनार करते हुए सिर्फ मजलूम और साहिबे किरदार के सामने सर झुकाने वाले, अदम्य वैचारिक और जनपक्षीय प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत अदम गोंडवी एक असाधारण रूप से साधारण इंसान थे। वे आमजन के कवि थे और उन्हीं के साथ सड़क के आदमी। बुझे चूल्हों से संवाद करती, संसद का फरेब जानती, विकास के आंकड़ों की हकीकत से गुजरकर चमारों की गली में ले जाती अदम की ग़ज़लें मजलूमों और मुफलिसों की पीड़ा, उसके जख्मों और आक्रोश का जिंदा दस्तावेज हैं। राजनैतिक ग़ज़लों की दुष्यंती परंपरा को वे एक नये मुकाम तक ले गए, उनकी शायरी में घुला तेज़ाब समूची व्यवस्था में खदबदाहट मचा देता है। होशोहवाश में बगावत का रास्ता दिखाने वाले अदम गोंडवी क्रांति की निरंतरता में यक़ीन करते थे और नई पीढियों की समझ और उनमें बदलाव की ललक तथा क्रांतिकारी उमंगों के प्रति काफी आशावादी थे। उनके क्रांतिकारी, जनपक्षीय सरोकारों और एक न्यायपूर्ण समाज के सपने को साकार करने की उनकी अदम्य ललक और प्रतिबद्धता को सलाम करते हुए हम यहां उनकी बहुचर्चित नज़्म ‘चमारों की गली’ प्रस्तुत कर रहे हैं। - रवि कुमार, रावतभाटा)

चमारों की गली 

  • अदम गोंडवी


आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को

मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर


मर गयी फुलिया बिचारी इक कुएं में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी


आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा

मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा


कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबरायी हुई

लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलायी हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है

जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को

सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाये खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से

घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोयी हुई जज्बात में


क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्ना बेखबर राहों में थी

मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गयी

छटपटायी पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गयी

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया

वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हंस रही थी मौज में

होश में आयी तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गयी थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था

जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है

पूछ तो बेटी से आखिर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं

कच्चा खा जाएंगे जिंदा उनको छोड़ेंगे नहीं


कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें

और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें

बोला कृष्ना से बहन, सो जा मेरे अनुरोध से

बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गयी इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में

वे इकट्ठे हो गये सरपंच के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लंबी नोक पर

देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई! क्या जमाना आ गया

कल तलक जो पांव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो

सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां

पड़ गया है सीप का मोती गंवारों के यहां


जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है

हाथ पुट्ठे पे न रखने देती है, मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ

फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गयी

जाने-अनजाने वो लज्जत जिंदगी की पा गयी

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गयी

वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है

हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की

गांव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया

हाथ मूंछों पर गये माहौल भी सन्ना गया


क्षणिक था आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था

हां, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफान वह पुर जोर था

भोर होते ही वहां का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में

एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -

‘‘जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आये सामने’’

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर

एक सिपाही ने तभी लाठी चलायी दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया

सुन पड़ा फिर ‘‘माल वो चोरी का तूने क्या किया’’

‘‘कैसी चोरी माल कैसा’’ उसने जैसे ही कहा

एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा


होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर

ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

‘‘मेरा मुंह क्या देखते हो! इसके मुंह में थूक दो

आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूंक दो’’

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहां चलने लगी

बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुंहा बच्चा व बुड्ढा जो वहां खेड़े में था

वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे

कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

‘‘कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएं नहीं

हुक्म जब तक मैं न दूं कोई कहीं जाए नहीं’’

यह दरोगा जी थे मुंह से शब्द झरते फूल से

आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से


फिर दहाड़े ‘‘इनको डंडों से सुधारा जाएगा

ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा’’

इक सिपाही ने कहा ‘‘साइकिल किधर को मोड़ दें

होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें’’

बोला थानेदार ‘‘मुर्गे की तरह मत बांग दो

होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है

ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है’’

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल

‘‘कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल’’

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को

सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को

प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को


मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गांव में

तट पे नदियों की घनी अमराइयों की छांव में

गांव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही

या अहिंसा की जहां पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए

बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए! 


 






मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

ढेकळ (मिट्टी का ढ़ेला)


स बार अभिव्यक्ति के 38वें अंक से हाड़ौती भाषा जो राजस्थानी का ही एक रूप है का एक गीत प्रस्तुत है। इस गीत में मिट्टी का ढ़ेला आप से अपनी बात कर रहा है कि वही है जिस से सारी सृष्टि का निर्माण हुआ है। 
 
हाड़ौती (राजस्थानी) गीत 

ढेकळ (मिट्टी का ढ़ेला)
  •  विष्णु 'विश्वास'
 
बना रूप अर बना कदर को,
न्ह कोयाँ सूँ राळ्यो - ढाळ्यो।
सब नै छोड़ दियो तो कांई,
धूप, बाळ, पाणी को पाळ्यो।।

ज्याँ कै लेखै बना बात ईं कण-कण होर बखर जाउँ,
ऊण्डा-ऊण्डा फाळ्या सह-सह अन्न-धन्न म्हूँ नपजाऊँ,
तो भी जस कोई न्ह ईं लेखै ही म्हूँ  बेकळ छूँ।
काँई ताना मारो म्हारै म्हूँ ढोयो ढेकळ छूँ।।

सौ-सौ बार गुंधूँ छूँ म्हूँ पण चाक चढूँ इतराऊँ,
पोवणी दिवाणी अर कै धूपाड़ो बण जाऊँ,
जीबा को चुस तो म्हारै भी चाहे रोज आग म्ह न्हाऊँ,
जण-जण की तस मेटू म्हारी सोचू तो मर जाऊँ,
बाळक-बोल अबोलक म्हूँ, बड़-बूढ़ा की अकल छूँ।
काँई ताना मारो म्हारै म्हूँ ढोयो ढेकळ छूँ।।

चांदी की कमजोरी कै वा ऐर-सेर को धन छै,
चूमासा म्ह काँसा पीतळ को बदरंग बदन छै,
बात करूँ हीरा-पन्ना की व्ह तो रूप-रतन छै,
जाणै जे ही जाणै छै कुण या मँ कण-कण छै,
कन्या पीण्ड बणा पूजै ईं कै अहसान तळै छूँ।
काँई ताना मारो म्हारै म्हूँ ढोयो ढेकळ छूँ।।

म्हारै हिवड़ै घणी रंधी तपस्याँ की जाई सीता,
अगन परीछा द्याँ पाछै भी रूस्यो रह्यो विधाता,
सपणा कद साँचा होया जै घोळ-घोळ कै पीता,
कतणी बार पढैर धरदा व्हा की व्हाई छै गीता,
अन्त घड़ी म्हं आडो आऊँ मूंडै तुळसी-दळ छूँ।
काँई ताना मारो म्हारै म्हूँ ढोयो ढेकळ छूँ।।

यूँ तो सारी की सारी म्हारी ही माया छै,
ऊँळी-सूँळी फर-फर चर ले राम की गायाँ छै,
छोटो मूण्डो बड़ी बात ये सब म्हारा जाया छै,
म्हारी असल शकल सूरत तो करषाणी काया छै,
पाणत करती हालण का म्हूँ पावाँ की पगतळ छूँ।
काँई ताना मारो म्हारै म्हूँ ढोयो ढेकळ छूँ।।

- ग्राम बालाखेड़ा, ग्राम पोस्ट बालदड़ा, तहसील अंता, जिला बाराँ (राजस्थान)

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

कुबेर की धरती ... ... रामकुमार कृषक


स वर्ष ख्यात कवि कुबेरदत्त को हमारे बीच नहीं रहे। इस आलेख में 'रामकुमार कृषक' उन की कविता का एक संक्षिप्त मूल्यांकन प्रस्तुत करते हैं।




कुबेर की धरती ... 
                                             
               ... रामकुमार कृषक
को भी कवि अपने काव्य-सरोकारों और शिल्प-संरचना से पहचाना जाता है। सरोकार बाहरी हो सकता है। जबकि उन्हें अनुभूतिगम्य बनाने का सम्बन्ध उसकी भीतरी दुनिया से होता है। एक ऐसी दुनिया, जिसमें न जाने कितना कुछ गम्य-अगम्य समाया रहता है। कई बार हमें हमारी जड़ संस्कारबद्धता परेशान करती है तो कई बार इतिहास और वर्तमान के अनाकलित अॅंधेरे। इसलिए प्रत्येक वह रचनाकार जो मानवीय और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ रचना करता है, उसे विकट आत्संघर्ष करना पड़ता है।

कवि कुबेरत्त को हम ऐसे ही आत्मसंघर्ष से गुजरते हुए देखते हैं। उनका रचना-फलक बहुआयामी और बहुस्तरीय है। अंतर्वस्तु और भाषा-शिल्प, दोनों ही दृष्टियों से वे प्रयोगधर्मी हैं। कला, साहित्य, संस्कृति और संगीत - सभी में उनकी आवाजाही है। इन तमाम अनुशासनों का, दूरदर्शन के लिए काम करते हुए तो उन्होंने उपयोग किया ही, अपनी रचनात्मकता को भी समृद्ध किया; और उसका कम हिस्सा ही अभी सामने आया है। आकस्मिक नहीं कि वे सिर्फ कवि की तरह नहीं, एक साहित्यकार की तहर काम करते दिखाई देते हैं। आचार्य किशोरी दास वाजपेयी और डॉ. रामविलास शर्मा पर उनका आलोचना-कर्म इसी बात की पुष्टि करता है।

कविताएँ भी कुबेर की उनके आलोचनात्मक विवेक की ही उपज हैं। पर्यवेक्षण उनके स्वभाव में है, और वे अपने समय के यथार्थ के भीतर तक जाते हैं। उनके कवि को जो सामने, सतह पर घटता हुआ दिखाई देता है, कविता के लिए सिर्फ वही काफी नहीं। आँखें जो देखती हैं, उनका एक आत्म भी है। कहिए कि कवि के आत्मचेतस मन की जो आँखें हैं, कुबेर उन्हें बंद रखकर कहीं से नहीं गुजरते।

धरती ने कहा फिरउनकी लम्बी कविताओं का संग्रह है। यों मैं उक्त शीर्षक कविता पर ही बात करना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले कुबेर के साथ-साथ उस अंधकूपमें भी झाँक लेना चाहता हूँ, जो अपने फंतासीनुमा आच्छादन के बावजूद हू-ब-हू मेरे देश के गोल गुंबद की तरहदिखाई देता है। मुक्तिबोध ने अॅंधेरे मेंलिखकर जो कुछ दिखाया था, इस कविता में उसी का परवर्ती यथार्थ; भले ही उतना संश्लिष्ट न हो, पर है अवश्य। भयावह दृश्यों की रचना करते हैं कुबेर और स्वातंत्र्योत्तर भारत की विडम्बनाओं का उद्घाटन भी -

पूरा अंधकूप / बदल रहा है भभकती सुर्ख गर्माहट में / आँखों के गड्ढों / में अॅंट रही है गर्म राख / चीखने की अंतिम कोशिश भी नाकाम.... और

अब चारों ओर / बहेगा जो यहॉं से शुरू होकर / अगले अनेक दशकों में / आग ही आग / धुआँ ही धुआँ / नर्क ही नर्क....

लेकिनइतिहास की राखऔर इस महादेश की मिट्टीसे कल को जो नया, अधूरा आदमी जन्मेगा, कवि में उसी से पूरा होने का विश्वास भी जीवित है, क्योंकि उसी मिट्टी से जन्मेंगे -

नए और सच्चे स्वप्न / निर्भीक फैसले / और अभियान / जिनमें खेल रहे होंगे / असंख्य बच्चे / वनस्पतियों की तरह।

हरी-भरी, लेकिन संकटग्रस्त वनस्पतियों का नर्तन कुबेर के यहाँ उस हद तक दिखाई देता है, जहाँ तक वे देख सकते हैं, जबकि उनके समकालीनों में यह बड़ी हद तक नदारद है। केरल प्रवासकी कविताएँ तो इसका अकाट्य प्रमाण हैं। उन्हें पढ़ते हुए यह जाना जा सकता है कि अंधकार भरे घोर नैराश्य में सकारात्मक सोच और संघर्ष का जीवनधर्मी उजास क्या होता है। हॅंसी ही नहीं, आँसू भी आँसू का उपचार हो सकते हैं। एक कविता है नेत्रामृतम्। कुछ भी कहने के बजाय पूरी कविता उद्धृत करना चाहता हूँ -

बह रही थी मवाद जब / आँखों से / साँसों में आता-जाता था / लावा विषयुक्त / दिमाग-प्रकोष्ठ जब / बॉयलर के हवाले था / उबल जिसमें रही थीं / सच्चाइयॉं / मिथ / शास्त्र / स्मृतियाँ... / तभी-तभी / प्रिया की आँख से गिरीं दो बूंद / गिरीं ऐन मेरी आँखों में / मेरी आँखों में बैठी / हजारों वर्ष बूढ़ी वृद्ध ने कहा - / नयनामृतम्! नयनामृतम्! / आँखों के जरिए / मस्तिष्क तक जो पहुँचा अमृत / मस्तिष्क में हुआ / धमाका जोरदार / उड़ गए तमाम बॉलयर / और लाक्षागृह!

आँखों से होकर मस्तिष्क तक पहुँची अमृत की धार और फिर उसमें हुए विस्फोट से उड़ जाने वाले तमाम बॉयलर और लाक्षागृह। कुबेर का कवि यहाँ जिस मिथक और यथार्थ से अपने समय को चिन्हित कर रहा है, उसमें प्रेम, करुणा और मेधा, तीनों की उपस्थिति है। अश्रुमय अमृत भी विस्फोटक हो सकता है। जो भी अशुभ और अमानवीय है, उसे जाना ही होगा। यह विश्वास, यह सकारात्मक सोच कुबेर के यहाँ बहुत मुखर है।

पुरुष और प्रकृति का रिश्ता अटूट है। स्त्री स्वयं प्रकृति है। उसका सारा भौतिक-अभौतिक प्रकृतिमय है। लेकिन पुरुष-वर्चस्वी इस विकसित और विकासमान सभ्यता ने दोनों के ही साथ क्या सिर्फ, सिर्फ? खिलवाड़ॉ। सिर्फ दोहन। कुबेर ने अपनी अनेक कविताओं में इसे अनेक तरह से कहा है रोशनी के शहतीर परकविता की कुछ पंक्तियाँ हैं -

नदी को मत बांधो / उसमें नहाते बच्चे डर जाएंगे / हो सके तो / देखो नदी को / उसके किनारे बैठकर देखो / कृतज्ञ होगी नदी।

और कुछ पंक्तियाँ अंतिम शीर्षककविता से -

क्या वह स्त्री है या / वक्त के बंद दरवाजों पर / पछाड़ खाती / कोई आह-कराह?

आकस्मिक नहीं कि धरती ने कहा फिरकविता की शुरुआत कुबेर दत्त स्त्री के प्रेमिल-वत्सल व्यक्तित्व के साथ करते हैं -

शुरू-शुरू की सदियों में / खूब हुआ यह, खूब हुआ / तुमने मेरे माथे के चुम्बन लिए बार-बार / मेरी केश-राशि में क्रीड़ाएँ कीं / हुए लोटपोट मेरी गोद में / वक्षों पर / कंधों पर / पीठ पर / जॉंघों पर / मेरी देह में की कूद-फांद / खूब-खूब लीलाएँ कीं / रंगा मेरे गालों को फूलों के रंगों से / कानों में सुनाए अनगिनत प्रेमराग / होठों पर रचे अनुपम प्रेमग्रंथ / रहे मुझमें पैबस्त पहरों-पहर / साल-दर-साल सदियों तक.... / रही में हरी-भरी, सदानीरा...

कविता इसी तरह शांत, मंथर गति से, किसी कथा-कहानी की तरह आगे बढ़ती है। कहीं कोई फंतासी या अमूर्तन नहीं। रूपक है सहज सम्प्रेषणीय। या किसी कालयात्री की तरह गतिशील। अपने ही विकास-इतिहास से गुजरती हुई धरती। कल क्या थी, आज क्या है। क्या से क्या बना दिया मेरी ही संतति ने मुझे। और वह अपने मनुष्य होने पर गर्व भी करता है!

इसी तरह का सुदीर्घ रूपक कुबेर ने एक और कविता में रचा था – ‘एशिया के नाम खतमें, जो इस संग्रह में नहीं है; हालांकि वर्षों पहले वह अलाव’ (अंक-8, मार्च-2000) में छपी थी। पूरी कविता एक कवि या व्यक्ति का एशिया से संवाद है, जहाँ उसकी प्रकृति-प्रदत्त संपदा की नव-साम्राज्यवादी लूट को प्रश्नांकित किया गया है -

पीले
, काले लबादों में छुपकर / सफेद, नीले, हरे, भगवे / धर्म-प्रचारकों के फरसों, त्रिशूलों / गंडासों को लहराते हुजूम के साथ / कब तक आते रहेंगे रहज़न / और सैनिक / तुम्हारी मासूम बस्तियों में? / कब तक बूढ़े आसमान पर जमता रहेगा / तेरे मासूम बच्चों का अवसाद? / आई.एम.एफ., डब्ल्यू.टी.ओ., विश्व बैंक / और संयुक्त राष्ट्रसंघ की गिरफ्त में / कब तक रहेंगे तेरे त्यौहार / ओणम, ईद, गुलाब, चम्पा, मोगरा, कैक्टस तक / नदी-नद, समुद्र, पंछी, हवाएँ, पहाड़, गुफाएँ / कब तक? / कब तक रहेंगे कैद में किसी पेंटागन / और किसी खाकी, खुफिया योजनाओं के गुप्त केन्द्र में?

लेकिन धरती के स्वर में आक्रोश नहीं, अवसाद है। उसके पर्यावरण में आज विनाशकारी बदलाव हो रहे हैं। दुनिया के लिए प्रकृति की यह सर्वाधिक गम्भीर चेतावनी है। राष्ट्रसंघ के झंडे तले दुनिया-भर के देश उसे सुन भले रहे हैं, कान नहीं दे रहे। सभी को अपने-अपने ऐशो-आराम की चिन्ता है, धरती और उसके बहुवर्णी जीवन-संरक्षण की नहीं। चिंताएँ रियोदेजे-नेरिया (ब्राजील), क्योटो (जापान) और कानकुन (मैक्सिको) से लेकर डरबन (दक्षिण अफ्रीका) तक पसरी हुई हैं, लेकिन औद्योगिक और आणविक विकास के सर्वग्रासी परिणामों की बराबर अनदेखी हो रही है। कुबेर की धरती हैरान-परेशान है, मनुष्य के पतन को लेकर। वह उसकी अति प्राचीन शांत आँखों मेंउफनतेरक्तिम महानदऔर उॅंगलियों में उग आए बघनखेदेख रही है। देख रही हैऋतुचक्रोंको रतिचक्रोंमें बदलते और डूबते हुए मदिरा के कुंडों में। यही नहीं, धरित्री या कविता के दृष्टि-दायरे में यह सब भी है -

तुम्हारी आँखों में उबलते गए / विषैले रसायनों के कड़ाह... / तुमने किए एक साथ हजारों अट्टहास / चबाईं वनस्पतियॉं / भॅंभोड़े वृक्ष, फल, खाद्यान्न.... हाड़-मांस / चूस रक्त / फेंक दिया फोक / रौंद दिए बागान, रौंद दिया समूचा पराग / कीच, काई, मल से सान लिया - / अपनी आत्मा का हर प्रकाश बिन्दु....

लेकिन अपने ही आत्महीन अॅंधेरों में पड़े लोगों को अपनी पतनशीलता कहाँ दिखती है। उसके भयावह परिणाम भी उसका रास्ता नहीं बदल पाते, जब तक कि सृष्टि का प्रत्येक परमाणु आग की आकाशगंगाओंऔर अग्नि-ब्रह्माण्डोंमें नहीं बदल जाता।

स्मरणीय है कि हमारी धरती ने पहले भी महायुद्धों की विभीषिकाएँ झेली हैं। बीसवीं सदी में दो-दो विश्वयुद्धों के साक्षी हम स्वयं हैं। छोटे-छोटे महायुद्ध तो खैर हमारे बाहर-भीतर लगातार चलते ही रहते हैं। यहाँ तक कि हमारे रक्ताणुओं में भी।

कुबेरदत्त युद्ध की, विनाश की, और सर्वोपरि किसी भी तरह के शोषण की व्यवस्था से क्षुब्ध हैं। इसी ने हमारी धरती और उसकी उर्वरता को बंजर बनाया है, और खेत-खलिहानों से लेकर नदियों-वनस्पतियों तक को उजाड़ा। रूप बदल-बदलकर इन व्यवस्थाओं ने धरती और धरती-पुत्रों को छला है। कुबेर अपनी अनेक कविताओं में अनेक तरह से इसे कहतें हैं। एशिया के नाम खतसे ही कुछ और पंक्तियाँ -

गर्भ में हैं जो बच्चे आज / वे तक हैं कर्ज़दार / उनकी माँओं का दूध / साइफन के ज़रिए / सूँत लेती हैं दलाल सरकारें / बदले में मिलती है / शब्दों की फॅंगस लगी खाई सिर्फ....

आज एक नई व्यवस्था हमारे सामने हैं - कुछ और जटिल, कुछ और व्रूळर। इसे हम वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण के नाम से जानते हैं। उदारीकरण, बाजारीकरण, उपभोक्तावाद आदि इसके अन्य नाम हैं। इस व्यवस्था में विश्व बैंक द्वारा नियंत्रित पूंजी भी आवारा पूंजी कहलाती है। विकासशील देशों पर आर्थिक गुलामी थोपना और बाजारों के सहारे उनका नागरिक-दोहन करना इसका पहला उद्देश्य है। कुबेरदत्त आर्थिक साम्राज्यवाद की इस समूची प्रक्रिया को भली प्रकार समझते हैं और उसके अमानवीय परिणामों के रेशे-रेशे को खोलते हैं। धरती के ही शब्दों में -

बदले रूप, नाम, चोले, मुद्राएँ, मुखौटे / हुए महाद्वीप, द्वीप, देश, देशांतर / प्रांतर / किले, फौज, स्वर्णमीनार / शाही खजाने / कहीं हुए राष्ट्राध्यक्ष, कहीं शाह, कहीं सम्राट / कहीं तानाशाह, कहीं संसद, रिश्वत, सिक्के, रूक्के / उतरे कहीं बहुराष्ट्रीय पूंजी-संजाल / और.... और अखिल विश्वीय पिंडारी गिरोह / दिक्कालों पर करते बलाघात / सूँतते हवा-पानी-आसमान-आग-अंतरिक्ष.... / अंततः भूल ही गए पूरी तरह / कि मैं हूँ तुम्हारी जमीन... अंततः धात्री!

यहॉं इतिहास भी है और इतिहास का भूगोल भी। पर्यवेक्षण ही नहीं, रुदन और उलाहना भी है। मातृ हृदय का दुख, क्षोभ और चीत्कार तो पूरी कविता में बार-बार सुनाई पड़ता है। लेकिन मनुष्य जाति के लिए अंततः एक चेतावनी भी सुनाई पड़ती है। विश्ववधूबनना धरती को स्वीकार नहीं। इतिहास गवाह है, नारी को नगरवधू बनाने वाले तमाम साम्राज्य भाप बन उड़ गए। ऐसे में उसे विश्ववधू बनाने का सपना देखने वालों का क्या होगा, वे भले ही न जानते हों, कवि और धरती दोनों जानते हैं -

तुम भी मिट्टी में मिल जाओगे

मैं तो फिर से हो जाउँगी


हरी-भरी
, सदानीरा....